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 नई दिल्ली  (आईएएनएस)। सुभाष चंद्र बोस के निधन (18 अगस्त, 1945 को ताइपे में एक विमान दुर्घटना में) के बाद उनकी अस्थियों के संरक्षण को लेकर बड़े पैमाने पर दस्तावेजी सबूत के साथ परिस्थितियों को उजागर करने वाली किताब लेड टू रेस्ट के लेखक आशीष रे (जो लंदन में रहते हैं), का मानना है कि जब तक नेताजी की अस्थियां अपने देश में नहीं लाई जातीं, तब तक उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए लगी होड़ सिर्फ पाखंड है। आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में रे का कहना है कि अगर आप 75 वर्षों से टोक्यो में रखी गईं उनकी अस्थियों को भारत लाकर श्रद्धा के साथ गंगा में विसर्जित नहीं करते, तब तक नेताजी को श्रद्धांजलि देना मात्र पाखंड और ढोंग है।

रे ने आगे कहा, मुझे नहीं लगता कि सुभाष चंद्र बोस अतीत में पश्चिम बंगाल में हुए चुनावों में कभी भावनात्मक मुद्दा रहे हैं। कांग्रेस, वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस, जो आजादी के बाद से राज्य की सरकार में रही हैं, नेताजी के नाम पर कभी नहीं जीते हैं।

प्रश्न : इस वर्ष नेताजी को श्रद्धांजलि देने के लिए राजनीतिक दलों के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा है?

उत्तर : ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक दल सुभाष बोस को श्रद्धांजलि देने के लिए एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं। ऐसे नेताजी को श्रद्धांजलि देना पाखंड और ढोंग ही है, यदि आप 75 साल से टोक्यो में पड़े उनके अवशेषों को श्रद्धांजलि देने के लिए शालीनता के साथ भारत नहीं लाते हैं। यह उनकी बेटी और एकमात्र उत्तराधिकारी प्रोफेसर अनीता बोस फाफ की दिली तमन्ना है कि अस्थियों को भारतीय मिट्टी पर लाया जाए, क्योंकि उनके पिता की महत्वाकांक्षा भारत को आजाद देखने की थी और उनके अस्थियों को बंगाली हिंदू परंपरा के साथ गंगा नदी में बहाया जाए।

प्रश्न : बंगाल चुनाव के लिए नेताजी कितने भावुक विषय हैं?

उत्तर : मुझे नहीं लगता कि सुभाष अतीत में कभी पश्चिम बंगाल चुनाव में भावनात्मक मुद्दा रहे हैं। कांग्रेस, वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस, जो आजादी के बाद से राज्य की सरकार में रही हैं, नेताजी के नाम पर कभी नहीं जीती हैं। भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति बोस की विचारधारा से बहुत अलग है। बोस का हमेशा हिंदू महासभा के साथ टकराव होता रहा, इसे नहीं भूलना चाहिए और उसी हिंदू महासभा से निकला जनसंघ आज भाजपा है।

प्रश्न : उन्हें श्रद्धांजलि देने का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या है?

उत्तर : सबसे अच्छा तरीका उनकी अस्थियों को भारत लाना है।

प्रश्न : उनकी अस्थियों को अब तक भारत क्यों नहीं लाया गया?

उत्तर : यह सवाल आपको सरकार से पूछना चाहिए। केंद्र सरकार ने सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को डीक्लासिफाइड कर दिया। फाइलों में तथ्यों की पुष्टि की गई थी। मोदी सरकार द्वारा आरटीआई के जवाब में यह बात कही गई है। जापान सरकार अनुरोध का इंतजार कर रही है। तब, भारत सरकार को अस्थियों को भारत लाने से क्या रोक रही है? ऐसा लगता है कि भारतीय जनता को मूर्ख बनाना राजनीतिक लाभ का अंश बन चुका है।

प्रश्न : क्या बंगाल चुनाव के कारण राजनीतिक दलों द्वारा नेताजी को याद किया जा रहा है?

उत्तर : आपका अंदाजा मेरी तरह सटीक है।

प्रश्न : उनकी सालगिरह के लिए के लिए समिति का गठन किया गया है। इसके लिए क्या सिफारिशें होनी चाहिए?

उत्तर : एक समिति का गठन नरेंद्र मोदी ने किया और दूसरा ममता बनर्जी ने बनाया। सुभास चंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के थे। वह दो बार इसके अध्यक्ष चुने गए। फिर भी कांग्रेस उन्हें भुनाने में पिछड़ी रही है। शायद, यह कोई बुरी बात नहीं है। वह कम से कम अवसरवाद में लिप्त नहीं है।



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Even today Netaji's bones are in London, after his death in a plane crash in 1945
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